Class 10 Science · Chapter 5 · हिंदी माध्यम
संक्षिप्त उत्तर:
इस अध्याय में NCERT के 21 इन-टेक्स्ट प्रश्न (5 पृष्ठ-वार सेट) और 13 अभ्यास प्रश्न — कुल 34 प्रश्न — सभी के हल दिए गए हैं। अध्याय का मूल: जो प्रक्रियाएँ एक जीव को जीवित रखती हैं उन्हें जीवन प्रक्रियाएँ कहते हैं — पोषण (स्वपोषी और विषमपोषी, प्रकाश-संश्लेषण, मानव पाचन तंत्र), श्वसन (वायवीय बनाम अवायवीय, ग्लूकोज़ विघटन के तीन रास्ते, मानव श्वसन तंत्र और वायुकोष), परिवहन (हृदय, रक्त वाहिकाएँ, द्विक परिसंचरण, लसीका, और पौधों में जाइलम-फ्लोएम), और उत्सर्जन (वृक्क, वृक्काणु, डायलिसिस, और पौधों के अपशिष्ट निकालने के तरीके)। यह जीव विज्ञान का सबसे चित्र-प्रधान और सबसे अधिक पूछा जाने वाला अध्याय है।
जीवन प्रक्रियाएँ वे सारे काम हैं जो एक जीव को हर समय करने पड़ते हैं — चाहे वह कुछ भी न कर रहा हो — केवल जीवित रहने के लिए। हमारे शरीर की कोशिकाएँ लगातार टूटती-बनती रहती हैं, इसलिए उन्हें मरम्मत और रखरखाव के लिए ऊर्जा चाहिए, और यह ऊर्जा बाहर से आए कच्चे पदार्थों (भोजन, ऑक्सीजन, जल) से आती है। छोटे जीव विसरण (diffusion) से काम चला लेते हैं, पर बड़े जीवों में हर कोशिका तक ऑक्सीजन और भोजन पहुँचाने के लिए अलग-अलग विशेषीकृत अंग-तंत्र चाहिए — यही इस अध्याय की पूरी कहानी है।
अध्याय 5 सारांश — 5 मिनट रिवीजन
1. जीवन प्रक्रियाएँ क्या हैं?
जो प्रक्रियाएँ मिलकर एक जीव का रखरखाव करती हैं, उन्हें जीवन प्रक्रियाएँ कहते हैं। ये तब भी चलती रहती हैं जब जीव कोई दृश्य गति न कर रहा हो (जैसे सोते समय, या एक पेड़ खड़ा हुआ)।
- पोषण (Nutrition) — बाहर से ऊर्जा स्रोत (भोजन) लेना और उससे ऊर्जा निकालना।
- श्वसन (Respiration) — भोजन का ऑक्सीकरण करके ऊर्जा (ATP) मुक्त करना।
- परिवहन (Transportation) — भोजन, ऑक्सीजन और अपशिष्ट को शरीर के एक हिस्से से दूसरे तक ले जाना।
- उत्सर्जन (Excretion) — रासायनिक अभिक्रियाओं से बने हानिकारक अपशिष्ट को शरीर से बाहर निकालना।
ज़रूरी बात: गति दिखना जीवित होने का पक्का प्रमाण नहीं है। एक पेड़ चलता नहीं फिर भी जीवित है। इसलिए वैज्ञानिक अणु स्तर की गति (कोशिकाओं के अंदर हो रही गतिविधि) को जीवन का मापदंड मानते हैं।
2. विसरण (Diffusion) पर्याप्त क्यों नहीं?
एककोशिकीय जीवों (अमीबा, पैरामीशियम) का पूरा शरीर-सतह पर्यावरण के संपर्क में होता है, इसलिए गैस विनिमय और भोजन ग्रहण साधारण विसरण से हो जाता है। बहुकोशिकीय जीवों में बहुत सी कोशिकाएँ अंदर होती हैं जो बाहर के संपर्क में नहीं होतीं, और विसरण बहुत धीमा है — मनुष्य के फेफड़ों से पैर की कोशिका तक ऑक्सीजन विसरण से पहुँचने में सालों लग जाएँगे। इसलिए विशेषीकृत ऊतक (रक्त, जाइलम, फ्लोएम) और पंपिंग अंग (हृदय) चाहिए।
3. पोषण
दो तरीके
- स्वपोषी (Autotrophic) — अपना भोजन स्वयं बनाते हैं सरल अकार्बनिक पदार्थों (CO2, H2O) से, सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल की सहायता से। जैसे हरे पौधे, नील-हरित शैवाल (साइनोबैक्टीरिया)।
- विषमपोषी (Heterotrophic) — दूसरे जीवों से तैयार कार्बनिक भोजन लेते हैं। जैसे प्राणी, कवक। इसके तीन उपप्रकार:
- मृतोपजीवी (Saprophytic) — मरे हुए/सड़ते पदार्थ से (कवक, यीस्ट, मशरूम, ब्रेड मोल्ड)
- परजीवी (Parasitic) — जीवित परपोषी से, परपोषी को हानि पहुँचाकर (कस्कुटा/अमरबेल, किलनी, जूँ, जोंक, फीताकृमि)
- प्राणिसम (Holozoic) — पूरा भोजन कण अंदर लेकर फिर पचाना (अमीबा, मनुष्य)
प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis)
वह प्रक्रिया जिसमें स्वपोषी सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल का उपयोग करके CO2 और H2O से कार्बोहाइड्रेट बनाते हैं:
6CO2 + 6H2O सूर्य का प्रकाश, क्लोरोफिल→ C6H12O6 + 6O2
तीन घटनाएँ (ज़रूरी नहीं कि एक साथ हों):
- क्लोरोफिल द्वारा प्रकाश ऊर्जा अवशोषित करना
- प्रकाश ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलना और जल के अणुओं को हाइड्रोजन + ऑक्सीजन में तोड़ना (प्रकाश-अपघटन)
- कार्बन डाइऑक्साइड का अपचयन (reduction) होकर कार्बोहाइड्रेट बनना
कच्चे पदार्थ और उनके स्रोत: CO2 — हवा से, रंध्रों (stomata) के माध्यम से (जलीय पौधे पानी में घुली CO2 लेते हैं)। जल + खनिज (N, P, Fe, Mg) — मिट्टी से, मूलरोमों के माध्यम से। सूर्य का प्रकाश और क्लोरोफिल — ऊर्जा और अवशोषण के लिए।
रंध्र (Stomata): पत्तियों की सतह पर छोटे छिद्र। गैस विनिमय और वाष्पोत्सर्जन का मार्ग। रक्षक कोशिकाएँ (guard cells) जल लेकर फूलती हैं तो छिद्र खुलता है; जल निकल जाने पर सिकुड़कर छिद्र बंद हो जाता है। बहुत सा जल वाष्पोत्सर्जन में उड़ता है, इसलिए जब CO2 की आवश्यकता नहीं होती तब रंध्र बंद रहते हैं।
मानव पाचन तंत्र — मुँह से गुदा तक
- मुँह (Mouth) — दाँत चबाकर भोजन का सतह-क्षेत्रफल बढ़ाते हैं। लार ग्रंथियों से लार आती है जिसमें लार एमाइलेज़ (ptyalin) होता है — स्टार्च को तोड़कर माल्टोज़/शर्करा बनाता है। लार भोजन को गीला और चिकना भी करती है ताकि निगलना आसान हो।
- ग्रासनली (Oesophagus) — क्रमाकुंचन गति (peristaltic movements) (दीवारों का लयबद्ध सिकुड़ना) भोजन को आगे धकेलती हैं। यह गति पूरी आहार नाल में होती है।
- आमाशय (Stomach) — जठर ग्रंथियों से निकलता है: HCl (अम्लीय माध्यम बनाता है जिसमें पेप्सिन काम करता है + जीवाणु मारता है), पेप्सिन (प्रोटीन-पाचक एंज़ाइम), और श्लेष्मा (mucus) (आमाशय की अपनी परत को अम्ल से बचाता है)। अवरोधनी पेशी (sphincter muscle) थोड़ा-थोड़ा करके भोजन छोटी आंत में भेजती है।
- छोटी आंत (Small intestine) — पाचन का सबसे बड़ा हिस्सा। यहाँ आता है:
- पित्त (Bile) (यकृत से, पित्ताशय में संग्रहित) — अम्लीय भोजन को क्षारीय बनाता है और वसा का इमल्सीकरण करता है (बड़ी वसा-गोलिकाओं को छोटी बूंदों में तोड़ना)। पित्त में एंज़ाइम नहीं होता।
- अग्न्याशयी रस (अग्न्याशय से) — ट्रिप्सिन (प्रोटीन), लाइपेज़ (इमल्सीकृत वसा)
- आंत्र रस — बचा हुआ पाचन पूरा करता है: कार्बोहाइड्रेट → ग्लूकोज़, प्रोटीन → एमीनो अम्ल, वसा → वसा अम्ल + ग्लिसरॉल
- बड़ी आंत (Large intestine) — बचा हुआ जल अवशोषित करती है; अपशिष्ट गुदा से बाहर (बहिःक्षेपण), गुदा अवरोधनी द्वारा नियंत्रित।
अमीबा में पोषण: कूटपाद (pseudopodia) से भोजन कण को घेरकर भोजन रिक्तिका (food vacuole) बनाता है → उसमें एंज़ाइमों से पाचन → अवशोषण → बचा हुआ अपशिष्ट सतह से बाहर। पैरामीशियम पक्ष्माभ (cilia) से भोजन को एक निश्चित मुँह-जैसे स्थान तक ले जाता है।
4. श्वसन (Respiration)
भोजन (ग्लूकोज़) को तोड़कर ऊर्जा मुक्त करना। पहला चरण सभी कोशिकाओं में समान होता है — कोशिकाद्रव्य में ग्लूकोज़ (6-कार्बन) टूटकर पाइरूवेट (3-कार्बन) बनता है। इसके बाद तीन रास्ते:
ग्लूकोज़ (6C) → पाइरूवेट (3C) + ऊर्जा [कोशिकाद्रव्य]
पाइरूवेट ऑक्सीजन की अनुपस्थिति, यीस्ट→ एथेनॉल + CO2 + ऊर्जा
पाइरूवेट ऑक्सीजन की कमी, पेशी कोशिकाएँ→ लैक्टिक अम्ल (3C) + ऊर्जा
पाइरूवेट + O2 माइटोकॉण्ड्रिया→ CO2 + H2O + बहुत अधिक ऊर्जा
- वायवीय श्वसन (Aerobic respiration) — ऑक्सीजन के साथ, माइटोकॉण्ड्रिया में, उत्पाद CO2 + H2O, ऊर्जा बहुत अधिक।
- अवायवीय श्वसन (Anaerobic respiration) — बिना ऑक्सीजन, कोशिकाद्रव्य में, उत्पाद एथेनॉल + CO2 (यीस्ट) या लैक्टिक अम्ल (पेशी), ऊर्जा कम।
- पेशी में ऐंठन (muscle cramps): तेज़ दौड़ते समय पेशियों को ऑक्सीजन कम पड़ती है, लैक्टिक अम्ल जमा हो जाता है, और दर्द होता है।
- मुक्त हुई ऊर्जा से ATP बनती है — कोशिका की "ऊर्जा मुद्रा"। ATP टूटने पर ऊर्जा मिलती है जो पेशी संकुचन, प्रोटीन संश्लेषण, तंत्रिका आवेग जैसे कामों में लगती है।
मानव श्वसन तंत्र
नासाछिद्र → नासा मार्ग (रोम और श्लेष्मा धूल रोकते हैं) → ग्रसनी → कंठ → श्वासनली (उपास्थि वलय इसे पिचकने से बचाते हैं) → ब्रोन्काई → श्वसनिकाएँ → वायुकोष (alveoli)।
- वायुकोष — गुब्बारे जैसी थैली, दीवार एक-कोशिका मोटी, चारों ओर रक्त केशिकाओं का जाल। वायुकोष का कुल सतह-क्षेत्रफल लगभग 80 m2 हो जाता है — एक टेनिस कोर्ट जितना! इसी वजह से गैस विनिमय इतनी तेज़ी से होता है।
- साँस लेते समय पसलियाँ ऊपर-बाहर और डायाफ्राम नीचे जाता है → छाती गुहा बड़ी → हवा अंदर। उल्टा होने पर हवा बाहर।
- हम पूरी हवा नहीं निकाल पाते — वायुकोष में हमेशा कुछ हवा रह जाती है ताकि ऑक्सीजन अवशोषित होने और CO2 मुक्त होने का समय मिले।
स्थलीय बनाम जलीय: हवा में ऑक्सीजन ~21% होती है, जबकि पानी में घुली ऑक्सीजन बहुत कम। इसलिए मछली को ज़्यादा तेज़ी से साँस लेनी पड़ती है (गलफड़ों से पानी लगातार बहाना पड़ता है), जबकि स्थलीय प्राणी आराम से कम श्वसन दर पर काम चला लेते हैं।
5. परिवहन (Transportation)
मानव — रक्त, हृदय, वाहिकाएँ, लसीका
- रक्त — तरल संयोजी ऊतक। प्लाज़्मा (भोजन, CO2, नाइट्रोजनी अपशिष्ट घुली अवस्था में), RBC (हीमोग्लोबिन — ऑक्सीजन ले जाता है), WBC (रोग प्रतिरोधक क्षमता), प्लेटलेट्स (थक्का जमाना)।
- हृदय — 4 कक्ष: दायाँ अलिंद, दायाँ निलय, बायाँ अलिंद, बायाँ निलय। कपाट रक्त को पीछे जाने से रोकते हैं। निलयों की दीवार अलिंदों से मोटी होती है क्योंकि उन्हें रक्त दूर तक पंप करना होता है; बाएँ निलय की दीवार सबसे मोटी (पूरे शरीर में भेजना है)।
- धमनियाँ — हृदय से रक्त ले जाती हैं, दीवार मोटी और लचीली (उच्च दाब), कपाट नहीं। शिराएँ — हृदय की ओर रक्त लाती हैं, दीवार पतली, कपाट होते हैं ताकि रक्त उल्टा न बहे। केशिकाएँ — एक-कोशिका मोटी दीवार, यहीं पदार्थों का आदान-प्रदान होता है।
- द्विक परिसंचरण — एक पूरे चक्र में रक्त दो बार हृदय से गुज़रता है:
- फुफ्फुसीय परिसंचरण: दायाँ निलय → फेफड़े → बायाँ अलिंद (अनॉक्सीजनित रक्त को ऑक्सीजन मिलती है)
- दैहिक परिसंचरण: बायाँ निलय → पूरा शरीर → दायाँ अलिंद
- लसीका (Lymph) — केशिकाओं से रिसकर निकला रंगहीन द्रव (प्लाज़्मा जैसा पर प्रोटीन कम, RBC नहीं)। अतिरिक्त ऊतक द्रव वापस रक्त में लाता है और छोटी आंत से पचे हुए वसा को ले जाता है।
पौधे — जाइलम और फ्लोएम
- जाइलम — जल और घुले खनिजों को जड़ से पत्तियों तक ले जाता है, केवल एक दिशा में (ऊपर)। यह एक सतत नली-जैसा नेटवर्क है। दो बल: रात में मूल दाब (root pressure) (आयन सक्रिय रूप से जड़ में आते हैं, परासरण से जल खिंचता है) और दिन में वाष्पोत्सर्जन कर्षण (पत्तियों से जल वाष्प बनकर उड़ता है तो नीचे से जल खिंचता है) — लंबे पेड़ों में वाष्पोत्सर्जन कर्षण ही मुख्य बल है। ATP सीधे खर्च नहीं होती — यह मुख्यतः भौतिक बल है।
- फ्लोएम — पत्तियों में बने भोजन (सुक्रोज़) और एमीनो अम्ल को पौधे के हर हिस्से तक, दोनों दिशाओं में ले जाता है (बढ़ते भाग, संग्रहण अंग, फल)। इसे स्थानांतरण (translocation) कहते हैं। यह ATP खर्च करके होता है: सुक्रोज़ चालनी नली में डालने से परासरण दाब बढ़ता है, जल अंदर आता है, और दाब बनता है जो भोजन को आगे धकेलता है।
वाष्पोत्सर्जन के लाभ: जल-खनिज का ऊर्ध्व परिवहन, और पौधे को ठंडा रखना (तापमान नियमन)।
6. उत्सर्जन (Excretion)
मानव उत्सर्जन तंत्र
दो वृक्क (kidneys) → दो मूत्रवाहिनी (ureters) → मूत्राशय (urinary bladder) → मूत्रमार्ग (urethra)।
वृक्काणु (Nephron) — वृक्क की मूल निस्पंदन इकाई (हर वृक्क में लाखों)।
- ग्लोमेरुलस — केशिकाओं का गुच्छा, यहाँ उच्च दाब पर रक्त निस्पंदित होता है।
- बोमन संपुट — प्याले जैसा हिस्सा जो निस्यंद (filtrate) एकत्र करता है।
- नलिका — यहाँ चयनात्मक पुनर्अवशोषण होता है: ग्लूकोज़, एमीनो अम्ल, अधिकतर जल और कुछ लवण वापस रक्त में चले जाते हैं। बचा हुआ यूरिया + अतिरिक्त जल + लवण = मूत्र।
- मूत्र संग्रह वाहिनी से होकर मूत्रवाहिनी में जाता है। मूत्राशय पेशीय होता है, भरने पर दाब महसूस होता है और मूत्र-त्याग होता है।
मूत्र की मात्रा किससे तय होती है? शरीर में कितना अतिरिक्त जल निकालना है, और कितने घुले हुए अपशिष्ट (जैसे यूरिया) निकालने हैं। गर्मी में पसीना अधिक आता है तो मूत्र कम और गाढ़ा; अधिक जल पीने पर मूत्र अधिक और पतला।
डायलिसिस: वृक्क विफल होने पर कृत्रिम वृक्क मशीन रक्त से नाइट्रोजनी अपशिष्ट हटा देती है। मशीन में चयनात्मक पारगम्य नलिकाएँ होती हैं जो डायलाइज़िंग द्रव में डूबी होती हैं (इसमें ग्लूकोज़ और लवण रक्त जितने ही होते हैं, इसलिए वे वापस नहीं जाते) — केवल अपशिष्ट विसरित होकर बाहर आता है। इसमें पुनर्अवशोषण नहीं होता।
पौधों में उत्सर्जन
- ऑक्सीजन और CO2 — रंध्रों और वातरंध्रों (lenticels) से विसरण द्वारा
- अतिरिक्त जल — वाष्पोत्सर्जन द्वारा
- अपशिष्ट पदार्थ कोशिका रसधानियों में संचित, या रेज़िन और गोंद के रूप में पुरानी जाइलम में जमा
- कुछ अपशिष्ट पत्तियों में जमा होकर पत्ती गिरने (leaf fall) के साथ निकल जाता है; कुछ आसपास की मिट्टी में छोड़ दिया जाता है
इन-टेक्स्ट प्रश्न — हल
प्रश्न 1. बहुकोशिकीय जीवों जैसे मनुष्यों की ऑक्सीजन आवश्यकता पूरी करने के लिए विसरण (diffusion) पर्याप्त क्यों नहीं है?
बहुकोशिकीय जीवों में शरीर का आकार बड़ा होता है और बहुत सी कोशिकाएँ अंदर (deep inside) होती हैं जो बाहर की हवा के सीधे संपर्क में नहीं आतीं। विसरण एक बहुत धीमी प्रक्रिया है — यह केवल छोटी दूरी पर ही प्रभावी है।
अगर मनुष्य केवल विसरण पर निर्भर करते तो फेफड़ों से पैर की कोशिकाओं तक ऑक्सीजन पहुँचने में बहुत लंबा समय लगता, और तब तक कोशिकाएँ मर जातीं। इसलिए मनुष्यों में एक परिवहन तंत्र (रक्त + हृदय + रक्त वाहिकाएँ) होता है जो हीमोग्लोबिन की मदद से ऑक्सीजन को हर कोशिका तक तेज़ी से पहुँचाता है।
प्रश्न 2. हम यह तय करने के लिए किन मापदंडों का उपयोग करते हैं कि कोई वस्तु जीवित है या नहीं?
आम तौर पर हम गति (movement) देखकर तय करते हैं — चलना, बोलना, साँस लेना, वृद्धि। पर यह मापदंड अधूरा है: एक पेड़ हिलता नहीं फिर भी जीवित है, और एक सोया हुआ व्यक्ति भी जीवित है।
इसलिए असली मापदंड है अणु स्तर (molecular level) पर होती गति — यानी कोशिकाओं के अंदर लगातार चल रही रासायनिक क्रियाएँ। जीवित जीवों में संरचनाएँ (ऊतक, कोशिकाएँ, अणु) टूटती रहती हैं और उनकी मरम्मत तथा रखरखाव के लिए लगातार ऊर्जा खर्च होती रहती है। यही जीवन प्रक्रियाओं का चलते रहना ही जीवित होने का पक्का प्रमाण है।
प्रश्न 3. एक जीव द्वारा बाहरी कच्चे पदार्थों (raw materials) का उपयोग किसलिए किया जाता है?
जीव को बाहर से ये कच्चे पदार्थ चाहिए:
- भोजन (nutrients) — ऊर्जा के लिए और नई कोशिकाओं/ऊतक बनाने तथा मरम्मत के लिए
- ऑक्सीजन — भोजन का ऑक्सीकरण करके ऊर्जा मुक्त करने के लिए (श्वसन)
- जल — शरीर की रासायनिक क्रियाओं का माध्यम, परिवहन और तापमान नियमन
पौधों के लिए कच्चे पदार्थ हैं CO2, जल, और मिट्टी से खनिज।
प्रश्न 4. जीवन बनाए रखने के लिए आप किन प्रक्रियाओं को आवश्यक मानेंगे?
ये चार जीवन प्रक्रियाएँ आवश्यक हैं:
- पोषण — ऊर्जा और पदार्थ का स्रोत लेना
- श्वसन — भोजन से ऊर्जा मुक्त करना
- परिवहन — भोजन, ऑक्सीजन और अपशिष्ट को शरीर के हर हिस्से तक पहुँचाना
- उत्सर्जन — हानिकारक अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना
प्रश्न 5. स्वपोषी और विषमपोषी पोषण में क्या अंतर हैं?
| स्वपोषी (Autotrophic) | विषमपोषी (Heterotrophic) |
|---|---|
| अपना भोजन स्वयं बनाते हैं | दूसरों द्वारा बनाए भोजन पर निर्भर रहते हैं |
| सरल अकार्बनिक पदार्थों (CO2, H2O) से | तैयार कार्बनिक भोजन से |
| क्लोरोफिल आवश्यक है | क्लोरोफिल नहीं होता |
| सूर्य का प्रकाश ऊर्जा स्रोत है | सूर्य के प्रकाश की सीधी आवश्यकता नहीं |
| उदाहरण: हरे पौधे, साइनोबैक्टीरिया | उदाहरण: प्राणी, कवक |
↔ Table ko side me swipe karein
प्रश्न 6. पौधे प्रकाश-संश्लेषण के लिए आवश्यक प्रत्येक कच्चा पदार्थ कहाँ से प्राप्त करते हैं?
- कार्बन डाइऑक्साइड — हवा से, पत्तियों के रंध्रों (stomata) द्वारा (जलीय पौधे पानी में घुली CO2 लेते हैं)
- जल — मिट्टी से, जड़ के मूलरोमों (root hairs) द्वारा, फिर जाइलम से पत्तियों तक
- खनिज (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, लोहा, मैग्नीशियम) — मिट्टी से आयनों के रूप में, जड़ द्वारा
- सूर्य का प्रकाश — सूर्य से, ऊर्जा के लिए
- क्लोरोफिल — पत्तियों के हरितलवक (chloroplast) में मौजूद, जो प्रकाश अवशोषित करता है
प्रश्न 7. हमारे आमाशय में अम्ल की क्या भूमिका है?
आमाशय की जठर ग्रंथियाँ (gastric glands) हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) बनाती हैं। इसके दो मुख्य कार्य हैं:
- यह आमाशय में अम्लीय माध्यम बनाता है, जो प्रोटीन-पाचक एंज़ाइम पेप्सिन के काम करने के लिए आवश्यक है (पेप्सिन अम्लीय pH में ही सक्रिय होता है)
- यह भोजन के साथ आए जीवाणुओं और कीटाणुओं को मार देता है
आमाशय अपनी दीवार को इस अम्ल से बचाने के लिए श्लेष्मा (mucus) स्रावित करता है।
प्रश्न 8. पाचक एंज़ाइमों का कार्य क्या है?
पाचक एंज़ाइम जैविक उत्प्रेरक (biological catalysts) हैं जो बड़े, जटिल, अघुलनशील भोजन अणुओं को तोड़कर छोटे, सरल, घुलनशील अणुओं में बदल देते हैं — ताकि वे आंत की दीवार से अवशोषित होकर रक्त में जा सकें।
- कार्बोहाइड्रेट (स्टार्च) → ग्लूकोज़ (एमाइलेज़)
- प्रोटीन → एमीनो अम्ल (पेप्सिन, ट्रिप्सिन)
- वसा → वसा अम्ल + ग्लिसरॉल (लाइपेज़)
प्रश्न 9. छोटी आंत पचे हुए भोजन को अवशोषित करने के लिए किस प्रकार बनी है?
छोटी आंत में अवशोषण के लिए ये अनुकूलन होते हैं:
- इसकी अंदरूनी दीवार पर हज़ारों छोटी उंगली जैसी विलाई (villi) होती हैं, जो अवशोषण का सतह-क्षेत्रफल बहुत बढ़ा देती हैं
- हर विलाई में रक्त वाहिकाओं का घना जाल होता है जो अवशोषित भोजन को तुरंत शरीर की हर कोशिका तक पहुँचा देता है
- विलाई की दीवार बहुत पतली होती है, इसलिए भोजन आसानी से पार हो जाता है
- छोटी आंत काफी लंबी होती है, जिससे भोजन को अवशोषित होने का पूरा समय मिलता है
प्रश्न 10. श्वसन के लिए ऑक्सीजन प्राप्त करने में स्थलीय जीव को जलीय जीव की तुलना में क्या लाभ है?
स्थलीय जीव हवा से ऑक्सीजन लेते हैं, जिसमें ऑक्सीजन की मात्रा लगभग 21% होती है। पानी में घुली हुई ऑक्सीजन बहुत कम होती है।
इसलिए जलीय जीवों (जैसे मछली) को उतनी ही ऑक्सीजन लेने के लिए बहुत तेज़ दर से साँस लेनी पड़ती है और गलफड़ों से लगातार पानी बहाना पड़ता है। स्थलीय जीव कम श्वसन दर पर ही अपनी आवश्यकता पूरी कर लेते हैं — यही उनका लाभ है।
प्रश्न 11. विभिन्न जीवों में ऊर्जा प्राप्त करने के लिए ग्लूकोज़ का ऑक्सीकरण किन-किन तरीकों से होता है?
पहला चरण सब जगह समान है — कोशिकाद्रव्य में ग्लूकोज़ (6-कार्बन) टूटकर पाइरूवेट (3-कार्बन) बनता है। इसके बाद तीन रास्ते हैं:
ग्लूकोज़ (6C) → पाइरूवेट (3C) + ऊर्जा [कोशिकाद्रव्य]
पाइरूवेट बिना ऑक्सीजन, यीस्ट→ एथेनॉल + CO2 + ऊर्जा
पाइरूवेट ऑक्सीजन की कमी, पेशी कोशिकाएँ→ लैक्टिक अम्ल + ऊर्जा
पाइरूवेट + O2 माइटोकॉण्ड्रिया→ CO2 + H2O + बहुत अधिक ऊर्जा
- अवायवीय (यीस्ट में — किण्वन): एथेनॉल और CO2 बनते हैं, ऊर्जा कम
- अवायवीय (हमारी पेशी कोशिकाओं में): लैक्टिक अम्ल बनता है जब ऑक्सीजन कम पड़ती है — इससे ऐंठन होती है
- वायवीय (माइटोकॉण्ड्रिया में): CO2 और जल बनते हैं, ऊर्जा सबसे अधिक
प्रश्न 12. मनुष्यों में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन कैसे होता है?
ऑक्सीजन: वायुकोष में हवा से ऑक्सीजन रक्त में विसरित होती है और RBC में मौजूद हीमोग्लोबिन से जुड़कर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है। रक्त इसे पूरे शरीर की कोशिकाओं तक ले जाता है, जहाँ हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन छोड़ देता है। हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन के लिए बंधुता अधिक होती है, इसलिए यह कुशल वाहक है।
कार्बन डाइऑक्साइड: CO2 पानी में हीमोग्लोबिन की तुलना में अधिक घुलनशील है, इसलिए इसे ले जाने के लिए विशेष वाहक की आवश्यकता नहीं। यह अधिकतर प्लाज़्मा में घुली हुई अवस्था में ऊतकों से फेफड़ों तक जाती है और वहाँ वायुकोष से बाहर छोड़ दी जाती है।
प्रश्न 13. मनुष्यों में फेफड़े गैसों के आदान-प्रदान के क्षेत्र को अधिकतम करने के लिए किस प्रकार बने होते हैं?
फेफड़ों में श्वासनली ब्रोन्काई में, फिर श्वसनिकाओं (bronchioles) में, और अंत में छोटी गुब्बारे जैसी थैलियों — वायुकोष (alveoli) — में बँट जाती है।
- दोनों फेफड़ों को मिलाकर वायुकोष का कुल सतह-क्षेत्रफल लगभग 80 वर्ग मीटर हो जाता है — एक टेनिस कोर्ट जितना
- हर वायुकोष की दीवार एक कोशिका जितनी पतली होती है
- वायुकोष के चारों ओर रक्त केशिकाओं का घना जाल होता है
इतने बड़े सतह-क्षेत्रफल और पतली दीवार के कारण गैस विनिमय बहुत तेज़ी से हो पाता है।
प्रश्न 14. मनुष्यों में परिवहन तंत्र के घटक क्या हैं? इन घटकों के कार्य क्या हैं?
- हृदय — पेशीय पंपिंग अंग; रक्त को पूरे शरीर में पंप करता है
- रक्त वाहिकाएँ — धमनियाँ हृदय से रक्त ले जाती हैं, शिराएँ हृदय तक वापस लाती हैं, केशिकाओं में पदार्थों का आदान-प्रदान होता है
- रक्त — तरल संयोजी ऊतक; ऑक्सीजन (हीमोग्लोबिन द्वारा), पचा हुआ भोजन, हार्मोन, CO2 और नाइट्रोजनी अपशिष्ट ले जाता है; WBC संक्रमण से बचाते हैं, प्लेटलेट्स थक्का जमाते हैं
- लसीका (lymph) — ऊतक से रिसा हुआ द्रव वापस रक्त में लाता है और छोटी आंत से पचे हुए वसा को ले जाता है; संक्रमण से भी लड़ता है
प्रश्न 15. स्तनधारियों और पक्षियों में ऑक्सीजनित और अनॉक्सीजनित रक्त को अलग रखना क्यों आवश्यक है?
स्तनधारी और पक्षी उष्णरक्त (warm-blooded) प्राणी हैं — उन्हें अपने शरीर का तापमान स्थिर रखना पड़ता है, और इसके लिए बहुत अधिक ऊर्जा चाहिए होती है।
इतनी ऊर्जा तभी मिल सकती है जब शरीर की कोशिकाओं तक पूरी तरह ऑक्सीजनित रक्त पहुँचे। अगर ऑक्सीजनित और अनॉक्सीजनित रक्त मिश्रित हो जाएँ तो रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा घट जाएगी और ऊर्जा उत्पादन कम हो जाएगा। इसलिए इनका हृदय चार कक्षों का होता है और द्विक परिसंचरण होता है, जिससे दोनों तरह का रक्त बिल्कुल अलग रहता है।
प्रश्न 16. उच्च संगठित पौधों में परिवहन तंत्र के घटक क्या हैं?
पौधों में दो संवहन ऊतक होते हैं, दोनों संवहनी ऊतक (vascular tissue) कहलाते हैं:
- जाइलम — जड़ से ली गई जल और घुले खनिजों को पत्तियों और ऊपर के हिस्सों तक ले जाता है (केवल एक दिशा — ऊपर की ओर)
- फ्लोएम — पत्तियों में बने भोजन (सुक्रोज़) और एमीनो अम्ल को पौधे के बाकी हिस्सों तक ले जाता है (दोनों दिशाओं में) — इसे स्थानांतरण कहते हैं
प्रश्न 17. पौधों में जल और खनिजों का परिवहन कैसे होता है?
जल और खनिज जाइलम से परिवहित होते हैं।
- जड़ के मूलरोम (root hair) मिट्टी से आयनों को सक्रिय रूप से लेते हैं। इससे जड़ और मिट्टी के बीच सांद्रण अंतर बनता है और परासरण (osmosis) से जल जड़ में प्रवेश करता है — इससे मूल दाब (root pressure) बनता है जो जल को थोड़ा ऊपर धकेलता है (विशेषकर रात में)।
- दिन में पत्तियों के रंध्रों से जल वाष्प बनकर उड़ता है (वाष्पोत्सर्जन), जिससे जाइलम में एक चूषण/वाष्पोत्सर्जन कर्षण (transpiration pull) बनता है जो जाइलम के स्तंभ में जल को लगातार ऊपर खींचता रहता है।
लंबे पेड़ों में वाष्पोत्सर्जन कर्षण ही मुख्य प्रेरक बल है।
प्रश्न 18. पौधों में भोजन का परिवहन कैसे होता है?
भोजन का परिवहन फ्लोएम के माध्यम से होता है; इस प्रक्रिया को स्थानांतरण (translocation) कहते हैं। फ्लोएम सुक्रोज़ और एमीनो अम्ल को पत्तियों से बढ़ते हुए भागों, जड़, फल और संग्रहण अंगों तक ले जाता है।
जाइलम के विपरीत, स्थानांतरण में ऊर्जा (ATP) खर्च होती है। सुक्रोज़ को ATP का उपयोग करके फ्लोएम की चालनी नलिकाओं में डाला जाता है। इससे फ्लोएम में परासरण दाब बढ़ जाता है और आसपास के ऊतक से जल अंदर आ जाता है। यह बढ़ा हुआ दाब पदार्थ को कम दाब वाले हिस्सों की ओर धकेल देता है। इसी कारण फ्लोएम दोनों दिशाओं में — ऊपर और नीचे — भोजन भेज सकता है, पौधे की आवश्यकता के अनुसार।
प्रश्न 19. वृक्काणुओं (nephrons) की संरचना और कार्यविधि का वर्णन कीजिए।
वृक्काणु वृक्क की मूल निस्पंदन इकाई है; हर वृक्क में ऐसे लाखों वृक्काणु होते हैं।
संरचना:
- ग्लोमेरुलस — रक्त केशिकाओं का एक गुच्छा, जिसे वृक्क धमनी की शाखा से रक्त मिलता है
- बोमन संपुट — प्याले के आकार की थैली जो ग्लोमेरुलस को घेरती है
- नलिका — बोमन संपुट से निकलती लंबी नली, जिसके चारों ओर केशिकाएँ लिपटी होती हैं; यह आगे संग्रह वाहिनी में खुलती है
कार्यविधि:
- ग्लोमेरुलस में उच्च दाब पर निस्पंदन होता है — जल, ग्लूकोज़, एमीनो अम्ल, लवण और यूरिया छनकर बोमन संपुट में आ जाते हैं (रक्त कोशिकाएँ और बड़े प्रोटीन नहीं जाते)
- नलिका में चयनात्मक पुनर्अवशोषण होती है — ग्लूकोज़, एमीनो अम्ल, अधिकतर जल और आवश्यक लवण वापस रक्त में ले लिए जाते हैं
- बचा हुआ यूरिया, अतिरिक्त जल और लवण = मूत्र, जो संग्रह वाहिनी से होकर मूत्रवाहिनी में, फिर मूत्राशय में जाता है और मूत्रमार्ग से बाहर निकल जाता है
प्रश्न 20. पौधों द्वारा उत्सर्जी पदार्थों से छुटकारा पाने के लिए किन तरीकों का उपयोग किया जाता है?
पौधों में वृक्क जैसा कोई विशेष उत्सर्जन अंग नहीं होता। वे ये तरीके अपनाते हैं:
- ऑक्सीजन और CO2 जैसी गैसें रंध्रों और वातरंध्रों (lenticels) से विसरण द्वारा बाहर
- अतिरिक्त जल वाष्पोत्सर्जन द्वारा बाहर
- कई अपशिष्ट पदार्थ कोशिका की रसधानियों (vacuoles) में संचित कर लिए जाते हैं
- कुछ अपशिष्ट रेज़िन और गोंद के रूप में पुरानी, काम न आने वाली जाइलम में जमा हो जाते हैं
- कुछ अपशिष्ट पत्तियों में जमा होते हैं और पत्ती गिरने (leaf fall) के साथ निकल जाते हैं
- कुछ अपशिष्ट आसपास की मिट्टी में छोड़ दिए जाते हैं
प्रश्न 21. मूत्र की उत्पादित मात्रा को कैसे नियंत्रित किया जाता है?
मूत्र की मात्रा मुख्यतः दो बातों पर निर्भर करती है:
- शरीर में कितना अतिरिक्त जल निकालना है — अधिक जल पीने पर या ठंड में पसीना कम आने पर मूत्र अधिक और पतला बनता है; गर्मी में पसीना अधिक आने पर मूत्र कम और गाढ़ा बनता है
- कितने घुले हुए अपशिष्ट (जैसे यूरिया) निकालने हैं — जितना अधिक नाइट्रोजनी अपशिष्ट, उतना अधिक जल उसके साथ निकालना पड़ता है
यह नियंत्रण वृक्काणु की नलिका में होने वाले चयनात्मक पुनर्अवशोषण से होता है — शरीर आवश्यकता के अनुसार तय करता है कि कितना जल वापस रक्त में लेना है।

Poore Class 10 Science ke handwritten colour notes
IITian & district toppers ke banaye short notes — revision-ready, diagram ke saath. Board se pehle poora syllabus 3 din me revise.
अभ्यास प्रश्न — हल (Q1–Q13)
प्रश्न 1. मानव शरीर में वृक्क (kidneys) किस तंत्र का भाग हैं — (a) पोषण (b) श्वसन (c) उत्सर्जन (d) परिवहन
(c) उत्सर्जन (excretion)
वृक्क रक्त से नाइट्रोजनी अपशिष्ट (यूरिया) छानकर मूत्र बनाते हैं, इसलिए ये उत्सर्जन तंत्र का हिस्सा हैं।
प्रश्न 2. पौधों में जाइलम (xylem) किसके लिए ज़िम्मेदार है — (a) जल का परिवहन (b) भोजन का परिवहन (c) एमीनो अम्ल का परिवहन (d) ऑक्सीजन का परिवहन
(a) जल का परिवहन
जाइलम जड़ से पत्तियों तक जल और घुले हुए खनिज ले जाता है। भोजन और एमीनो अम्ल फ्लोएम से जाते हैं।
प्रश्न 3. स्वपोषी पोषण (autotrophic mode) के लिए आवश्यक है — (a) कार्बन डाइऑक्साइड और जल (b) क्लोरोफिल (c) सूर्य का प्रकाश (d) उपरोक्त सभी
(d) उपरोक्त सभी
प्रकाश-संश्लेषण के लिए CO2, जल, क्लोरोफिल और सूर्य का प्रकाश — चारों आवश्यक हैं।
प्रश्न 4. पाइरूवेट के विघटन से कार्बन डाइऑक्साइड, जल और ऊर्जा बनने की प्रक्रिया कहाँ होती है — (a) कोशिकाद्रव्य (b) माइटोकॉण्ड्रिया (c) हरितलवक (d) केंद्रक
(b) माइटोकॉण्ड्रिया
ग्लूकोज़ से पाइरूवेट कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) में बनता है, परंतु पाइरूवेट का ऑक्सीजन के साथ CO2 और जल में टूटना (वायवीय श्वसन) माइटोकॉण्ड्रिया में होता है — इसीलिए माइटोकॉण्ड्रिया को कोशिका का 'पावरहाउस' कहते हैं।
प्रश्न 5. हमारे शरीर में वसा का पाचन कैसे होता है? यह प्रक्रिया कहाँ होती है?
वसा का पाचन छोटी आंत (small intestine) में होता है, दो चरणों में:
- इमल्सीकरण (emulsification): यकृत से आया पित्त रस (bile juice) बड़ी वसा-गोलिकाओं को तोड़कर छोटी-छोटी बूंदों में बदल देता है। इससे वसा का सतह-क्षेत्रफल बढ़ जाता है ताकि एंज़ाइम आसानी से काम कर सके। (पित्त में एंज़ाइम नहीं होता, यह केवल भौतिक क्रिया करता है और माध्यम को क्षारीय बनाता है।)
- एंज़ाइम क्रिया: अग्न्याशय (pancreas) से आया लाइपेज़ (lipase) इमल्सीकृत वसा को तोड़कर वसा अम्ल और ग्लिसरॉल बना देता है।
ये सरल उत्पाद विलाई द्वारा अवशोषित हो जाते हैं।
प्रश्न 6. भोजन के पाचन में लार (saliva) की क्या भूमिका है?
लार लार ग्रंथियों से मुँह में आती है। इसके कार्य:
- इसमें एंज़ाइम लार एमाइलेज़ (ptyalin) होता है जो स्टार्च को तोड़कर सरल शर्करा (माल्टोज़) बना देता है — यानी कार्बोहाइड्रेट का पाचन मुँह से ही शुरू हो जाता है
- यह भोजन को गीला और चिकना कर देता है, जिससे चबाना और निगलना आसान हो जाता है
- यह मुँह में हल्का क्षारीय माध्यम बनाता है जिसमें एमाइलेज़ ठीक से काम करता है
प्रश्न 7. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ क्या हैं और इसके उपोत्पाद (by-products) क्या हैं?
आवश्यक परिस्थितियाँ:
- कार्बन डाइऑक्साइड (हवा से, रंध्रों द्वारा)
- जल (मिट्टी से, जड़ द्वारा)
- क्लोरोफिल (प्रकाश अवशोषित करने के लिए)
- सूर्य का प्रकाश (ऊर्जा स्रोत)
6CO2 + 6H2O सूर्य का प्रकाश, क्लोरोफिल→ C6H12O6 + 6O2
उपोत्पाद: ऑक्सीजन (जो हवा में मुक्त होती है)। बना हुआ कार्बोहाइड्रेट आवश्यकता से अधिक हो तो उसे स्टार्च के रूप में संचित किया जाता है। जल भी एक उपोत्पाद के रूप में निकल सकता है।
प्रश्न 8. वायवीय (aerobic) और अवायवीय (anaerobic) श्वसन में क्या अंतर हैं? अवायवीय श्वसन करने वाले कुछ जीवों के नाम लिखिए।
| वायवीय श्वसन | अवायवीय श्वसन |
|---|---|
| ऑक्सीजन की उपस्थिति में होता है | ऑक्सीजन के बिना होता है |
| माइटोकॉण्ड्रिया में (पहला चरण कोशिकाद्रव्य में) | केवल कोशिकाद्रव्य में |
| ग्लूकोज़ पूरी तरह टूटता है | ग्लूकोज़ अधूरा टूटता है |
| उत्पाद: CO2 + H2O | उत्पाद: एथेनॉल + CO2 (यीस्ट) या लैक्टिक अम्ल (पेशी) |
| ऊर्जा बहुत अधिक मिलती है | ऊर्जा बहुत कम मिलती है |
↔ Table ko side me swipe karein
अवायवीय श्वसन करने वाले जीव: यीस्ट, और कुछ जीवाणु (जैसे Clostridium या लैक्टिक अम्ल जीवाणु)। हमारी पेशी कोशिकाएँ भी भारी व्यायाम के समय, जब ऑक्सीजन कम पड़ती है, कुछ देर के लिए अवायवीय रूप से श्वसन करती हैं और लैक्टिक अम्ल बनाती हैं — इससे ऐंठन होती है।
प्रश्न 9. वायुकोष (alveoli) गैसों के आदान-प्रदान को अधिकतम करने के लिए कैसे बने होते हैं?
- वायुकोष गुब्बारे जैसी थैली होती है और इनकी संख्या करोड़ों में होती है — दोनों फेफड़ों को मिलाकर सतह-क्षेत्रफल लगभग 80 m2 हो जाता है
- हर वायुकोष की दीवार एक कोशिका जितनी पतली होती है, इसलिए गैसें आसानी से विसरित हो जाती हैं
- वायुकोष के चारों ओर रक्त केशिकाओं का घना जाल होता है, जिससे विनिमय हुई गैसें तुरंत रक्त में चली जाती हैं
- वायुकोष की सतह नम (moist) होती है, जिससे गैसें घुलकर विसरित हो सकें
प्रश्न 10. हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी के क्या परिणाम होंगे?
हीमोग्लोबिन RBC में होता है और ऑक्सीजन का वाहक है। इसकी कमी होने पर:
- रक्त की ऑक्सीजन वहन क्षमता घट जाती है
- कोशिकाओं को पूरी ऑक्सीजन नहीं मिलती, इसलिए वायवीय श्वसन कम होता है और ऊर्जा उत्पादन गिर जाता है
- व्यक्ति को थकान, कमज़ोरी, साँस फूलना, चक्कर आना और चेहरा पीला पड़ जाना जैसे लक्षण होते हैं
इस स्थिति को एनीमिया (anaemia) कहते हैं।
प्रश्न 11. मनुष्यों में द्विक परिसंचरण (double circulation) का वर्णन कीजिए। यह क्यों आवश्यक है?
द्विक परिसंचरण का अर्थ है कि एक पूरा चक्र पूरा करने में रक्त दो बार हृदय से गुज़रता है। इसके दो भाग हैं:
- फुफ्फुसीय परिसंचरण: दायाँ अलिंद → दायाँ निलय → फेफड़े (यहाँ CO2 छोड़कर ऑक्सीजन लेता है) → बायाँ अलिंद
- दैहिक परिसंचरण: बायाँ अलिंद → बायाँ निलय → महाधमनी से पूरे शरीर में → शरीर से अनॉक्सीजनित रक्त वापस दायाँ अलिंद में
क्यों आवश्यक है: इससे ऑक्सीजनित और अनॉक्सीजनित रक्त बिल्कुल मिश्रित नहीं होते, इसलिए शरीर की कोशिकाओं तक पूरी तरह ऑक्सीजन-युक्त रक्त पहुँचता है। मनुष्य उष्णरक्त हैं — शरीर का तापमान स्थिर रखने में बहुत ऊर्जा लगती है, और वह ऊर्जा तभी बनेगी जब ऑक्सीजन आपूर्ति कुशल हो।
प्रश्न 12. जाइलम और फ्लोएम में पदार्थों के परिवहन में क्या अंतर हैं?
| जाइलम | फ्लोएम |
|---|---|
| जल और घुले खनिजों का परिवहन | बना हुआ भोजन (सुक्रोज़) और एमीनो अम्ल का परिवहन |
| जड़ से पत्तियों की ओर — केवल एक दिशा (ऊपर) | दोनों दिशाओं में — ऊपर और नीचे, आवश्यकता के अनुसार |
| ATP की सीधी आवश्यकता नहीं — मूल दाब और वाष्पोत्सर्जन कर्षण (भौतिक बल) | ATP ऊर्जा खर्च होती है (सक्रिय प्रक्रिया) |
| मृत संवहन कोशिकाएँ (वाहिकाएँ, वाहिनिकाएँ) | जीवित संवहन कोशिकाएँ (चालनी नलिकाएँ + सहचर कोशिकाएँ) |
↔ Table ko side me swipe karein
प्रश्न 13. फेफड़ों में वायुकोष (alveoli) और वृक्क में वृक्काणु (nephron) की कार्यप्रणाली की तुलना उनकी संरचना और कार्य के संदर्भ में कीजिए।
| बिंदु | वायुकोष (फेफड़े) | वृक्काणु (वृक्क) |
|---|---|---|
| तंत्र | श्वसन तंत्र | उत्सर्जन तंत्र |
| संरचना | गुब्बारे जैसी थैली, दीवार एक कोशिका मोटी, चारों ओर केशिकाएँ | ग्लोमेरुलस (केशिका गुच्छ) + बोमन संपुट + लंबी नलिका, चारों ओर केशिकाएँ |
| कार्य | गैसों का आदान-प्रदान — ऑक्सीजन अंदर, CO2 बाहर | रक्त से नाइट्रोजनी अपशिष्ट (यूरिया) छानना और मूत्र बनाना |
| प्रक्रिया | विसरण (सांद्रण अंतर से) | निस्पंदन (दाब से) + चयनात्मक पुनर्अवशोषण |
| अपशिष्ट कहाँ जाता है | CO2 साँस के साथ बाहर | यूरिया मूत्र के साथ बाहर |
↔ Table ko side me swipe karein
समानता: दोनों की दीवार बहुत पतली होती है, दोनों के चारों ओर रक्त केशिकाओं का घना जाल होता है, दोनों की संख्या बहुत अधिक होती है — और दोनों का उद्देश्य है रक्त को साफ़/तरोताज़ा करना।
महत्वपूर्ण समीकरण — एक नज़र में
| प्रक्रिया | अंग / संरचना | कार्य | याद रखने वाली बात |
|---|---|---|---|
| पोषण | मुँह (लार ग्रंथियाँ) | लार एमाइलेज़ स्टार्च को शर्करा में तोड़ता है | कार्बोहाइड्रेट पाचन यहीं से शुरू |
| ग्रासनली (oesophagus) | क्रमाकुंचन (peristalsis) से भोजन को आगे धकेलना | यहाँ कोई पाचन नहीं होता | |
| आमाशय (stomach) | HCl + पेप्सिन + श्लेष्मा — प्रोटीन पाचन | HCl माध्यम अम्लीय बनाता है; श्लेष्मा दीवार बचाता है | |
| यकृत (पित्त) | वसा का इमल्सीकरण + माध्यम क्षारीय करना | पित्त में कोई एंज़ाइम नहीं होता | |
| अग्न्याशय (pancreas) | ट्रिप्सिन (प्रोटीन), लाइपेज़ (वसा) | अग्न्याशयी रस छोटी आंत में गिरता है | |
| छोटी आंत (विलाई) | पाचन पूरा + अवशोषण | विलाई सतह-क्षेत्रफल बढ़ाती हैं | |
| बड़ी आंत | जल का अवशोषण, अपशिष्ट का बहिःक्षेपण | गुदा अवरोधनी निकास नियंत्रित करती है | |
| श्वसन | श्वासनली (trachea) | हवा का मार्ग | उपास्थि वलय इसे पिचकने से रोकते हैं |
| वायुकोष (alveoli) | गैस विनिमय — O2 अंदर, CO2 बाहर | सतह-क्षेत्रफल ~80 m2, दीवार 1 कोशिका मोटी | |
| डायाफ्राम + पसलियाँ | छाती गुहा का आकार बदलकर श्वसन | डायाफ्राम नीचे = साँस अंदर | |
| माइटोकॉण्ड्रिया | पाइरूवेट का वायवीय ऑक्सीकरण, ATP बनाना | "कोशिका का पावरहाउस" | |
| परिवहन | हृदय (4 कक्ष) | रक्त को पंप करना | बाएँ निलय की दीवार सबसे मोटी |
| धमनियाँ (arteries) | हृदय से रक्त ले जाना | मोटी लचीली दीवार, कपाट नहीं | |
| शिराएँ (veins) | हृदय तक रक्त लाना | पतली दीवार, कपाट होते हैं | |
| केशिकाएँ (capillaries) | पदार्थों का आदान-प्रदान | दीवार केवल एक कोशिका मोटी | |
| जाइलम | जल + खनिज, जड़ से पत्तियों तक | एक दिशा; वाष्पोत्सर्जन कर्षण मुख्य बल | |
| फ्लोएम | भोजन का स्थानांतरण (translocation) | दोनों दिशा; ATP खर्च होती है | |
| उत्सर्जन | ग्लोमेरुलस | उच्च दाब पर रक्त का निस्पंदन | रक्त कोशिकाएँ और बड़े प्रोटीन निस्पंदित नहीं होते |
| बोमन संपुट | निस्यंद (filtrate) एकत्र करना | ग्लोमेरुलस को घेरने वाला प्याला | |
| नलिका (tubule) | चयनात्मक पुनर्अवशोषण (ग्लूकोज़, एमीनो अम्ल, जल) | यही मूत्र की मात्रा तय करता है | |
| पौधे (रंध्र, रसधानी, रेज़िन) | गैसें, अतिरिक्त जल और अपशिष्ट निकालना | पौधों में अलग उत्सर्जन अंग नहीं होता |
↔ Table ko side me swipe karein
सामान्य गलतियाँ — यहाँ अंक कटते हैं
- जाइलम और फ्लोएम की दिशा उलटी लिख देना। जाइलम = जल, केवल ऊपर (जड़ से पत्तियों तक), भौतिक बल से। फ्लोएम = भोजन, दोनों दिशाओं में, ATP खर्च करके। युक्ति: 'X' ऊपर की ओर तिरछी रेखाएँ — जाइलम केवल ऊपर; 'Ph' = Food, जहाँ चाहिए वहाँ।
- धमनियों और शिराओं को ऑक्सीजन से परिभाषित कर देना। परिभाषा दिशा से होती है, ऑक्सीजन से नहीं: धमनियाँ हृदय से ले जाती हैं, शिराएँ हृदय तक लाती हैं। दो अपवाद याद रखें — फुफ्फुसीय धमनी में अनॉक्सीजनित रक्त होता है और फुफ्फुसीय शिरा में ऑक्सीजनित। कपाट केवल शिराओं में होते हैं।
- अवायवीय श्वसन के उत्पाद गड़बड़ करना। यीस्ट में → एथेनॉल + CO2 (किण्वन)। हमारी पेशी कोशिकाओं में → लैक्टिक अम्ल (CO2 नहीं बनती!)। वायवीय में → CO2 + H2O। परीक्षा में पूछे जाने पर जीव का नाम देखकर उत्तर लिखें।
- पित्त को एंज़ाइम कह देना। पित्त रस में कोई पाचक एंज़ाइम नहीं होता। यह केवल दो काम करता है — अम्लीय भोजन को क्षारीय बनाना और वसा का इमल्सीकरण। वसा को वास्तव में तोड़ता है लाइपेज़, जो अग्न्याशय से आता है।
- ग्लूकोज़ विघटन का पहला चरण माइटोकॉण्ड्रिया में लिख देना। ग्लूकोज़ → पाइरूवेट हमेशा कोशिकाद्रव्य में होता है, सभी जीवों में। केवल पाइरूवेट का आगे वायवीय विघटन (CO2 + H2O) माइटोकॉण्ड्रिया में होता है। बहुविकल्पीय में यह सबसे अधिक गलत होने वाला बिंदु है।
- वृक्काणु में निस्पंदन और पुनर्अवशोषण का क्रम उलटा लिख देना। पहले ग्लोमेरुलस में निस्पंदन (सब कुछ निकल जाता है — ग्लूकोज़, एमीनो अम्ल, लवण, जल, यूरिया), फिर नलिका में चयनात्मक पुनर्अवशोषण (काम की चीज़ें वापस)। लोग अक्सर लिख देते हैं कि ग्लूकोज़ फिल्टर ही नहीं होता — ग्लूकोज़ फिल्टर होता है, बाद में वापस ले लिया जाता है।
बोर्ड-शैली महत्वपूर्ण प्रश्न
- 1 अंक: वायवीय श्वसन के अंतिम उत्पाद लिखिए और बताइए ये कोशिका के किस भाग में बनते हैं।
- 2 अंक: पित्त रस में कोई एंज़ाइम नहीं होता, फिर भी वसा के पाचन के लिए यह आवश्यक है — क्यों? दो कारण लिखिए।
- 3 अंक: वृक्काणु (nephron) का नामांकित (labelled) चित्र बनाइए और निस्पंदन तथा चयनात्मक पुनर्अवशोषण को समझाइए।
- 3 अंक: जाइलम और फ्लोएम में होने वाले परिवहन में कोई तीन अंतर लिखिए। किसमें ATP खर्च होती है और क्यों?
- 5 अंक: (a) मानव हृदय का नामांकित चित्र बनाकर द्विक परिसंचरण समझाइए। (b) स्तनधारियों और पक्षियों में ऑक्सीजनित और अनॉक्सीजनित रक्त का अलग रहना क्यों आवश्यक है?
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
जीवन प्रक्रियाएँ कितनी हैं और कौन-कौन सी हैं?
चार मुख्य जीवन प्रक्रियाएँ हैं — पोषण, श्वसन, परिवहन और उत्सर्जन। ये सब मिलकर जीव का रखरखाव करती हैं। कुछ किताबें नियंत्रण-समन्वय और जनन को भी जोड़ती हैं, पर इस अध्याय में ये चार ही शामिल हैं।
प्रकाश-संश्लेषण का समीकरण क्या है?
6CO2 + 6H2O, सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल की उपस्थिति में, C6H12O6 + 6O2 बनाता है। यानी कार्बन डाइऑक्साइड और जल से ग्लूकोज़ बनता है और ऑक्सीजन उपोत्पाद के रूप में निकलती है।
तेज़ दौड़ने के बाद पैर में ऐंठन (cramps) क्यों आती है?
तेज़ दौड़ने में पेशियों को उतनी ऑक्सीजन नहीं मिल पाती जितनी चाहिए। तब वे अवायवीय श्वसन करती हैं और पाइरूवेट से लैक्टिक अम्ल बन जाता है। यही लैक्टिक अम्ल पेशियों में जमकर दर्द और ऐंठन पैदा करता है। आराम करने और मालिश से रक्त प्रवाह बढ़ता है और लैक्टिक अम्ल हट जाता है।
पित्त में एंज़ाइम नहीं होता तो वह पाचन में कैसे काम करता है?
पित्त दो काम करता है। एक, आमाशय से आए अम्लीय भोजन को क्षारीय बना देता है ताकि अग्न्याशयी एंज़ाइम काम कर सकें। दो, वह वसा की बड़ी बूंदों को छोटी बूंदों में तोड़ देता है — इसे इमल्सीकरण कहते हैं — जिससे लाइपेज़ एंज़ाइम के लिए सतह-क्षेत्रफल बढ़ जाता है।
जाइलम और फ्लोएम में सबसे बड़ा फ़र्क क्या है?
जाइलम जल और खनिजों को केवल ऊपर की ओर ले जाता है और इसमें ATP सीधे खर्च नहीं होती — वाष्पोत्सर्जन कर्षण काम करता है। फ्लोएम भोजन को दोनों दिशाओं में ले जाता है और इसके लिए ATP ऊर्जा खर्च होती है।
डायलिसिस क्या है और यह वृक्क से कैसे अलग है?
वृक्क विफल होने पर डायलिसिस मशीन रक्त से यूरिया और अन्य नाइट्रोजनी अपशिष्ट हटा देती है। मशीन में चयनात्मक पारगम्य नलिकाएँ होती हैं जो डायलाइज़िंग द्रव में डूबी रहती हैं; इस द्रव में ग्लूकोज़ और लवण रक्त जितने ही रखे जाते हैं ताकि वे बाहर न जाएँ। सबसे बड़ा फ़र्क यह है कि डायलिसिस में चयनात्मक पुनर्अवशोषण नहीं होता — यह केवल अपशिष्ट हटा सकती है, वृक्क की तरह ज़रूरी चीज़ें वापस नहीं ले सकती।
Class 10 Science — सभी अध्याय (हिंदी)

Board exam tak sirf revision karna hai?
Class 10 Science ke saare chapters ke colour handwritten short notes — diagrams, formulas aur important points ek jagah.
NCERT Kaksha एक स्वतंत्र शैक्षणिक platform है और NCERT या CBSE से आधिकारिक रूप से संबद्ध (officially affiliated) नहीं है। किसी गलती की जानकारी देने के लिए contact करें।